Wednesday, 7 November 2018

एक उर्दू लेखिका की नजर में लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताएं

لکشمی کانت مکل کی ہندی شاعری مجھے تركقيپسد نظریہ، مكاميت، وقت کی نذاقت، ابهام کے حوالے سے دور دورہ کے حقیقت کی نقاب کشائی اور تاررف کا احساس ہوتا هےنكے اشارات میں گاؤں کی معطر فجا اور کھیتی باڑی کا مزاج واضح ہے، چنانچہ اس میں خود وطن کے خام امرد کی مہک بھی ملتی هےشايري کے الفاج میں یہ بولی ٹھولي سے متاثر پاكدامن اہل -كلم ہیں، جہاں مقدس بیابان میں شذر پر سرخ چوںچ کا پرندہ چیختا هےنكي شاعری سے گزرتے وكتت ایسا محسوس ہوتا ہے کہ قافلہ میں چلتے ہوئے ہم کسی ہمراہ اچانک اپنا دل دے چکے ہ.....               ✍ربينا سهسرامي

डॉ. देवेंद्र चौबे की दृष्टि में लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताएं

Lakshmi kant Mukul is an active poet of our time . published a few years"Lal chonch wale panchhi" is an important collection of his Hindi poems. Buxar soil, there is their deep inside the ability to see the struggle of the traditions of philosophy, nature and life, etc. His poems indigenous mind and helps in understanding these variant expressions ----------- - Devendra Chaubey, Noted Writer and Academician.

लक्ष्मीकांत मुकुल की एक भोजपुरी कविता

(भोजपुरी कविता)         


भरकी में चहुपल भईसा /लक्ष्मीकांत मुकुल


( l )

आवेले ऊ भरकी से


कीच पांक में गोड लसराइल


आर – डंडार प धावत चउहदी


हाथ में पोरसा भ के गोजी थमले


इहे पहचान रहल बा उनकर सदियन से


तलफत घाम में चियार लेखा फाट जाला


उनका खेतन के छाती


पनचहल होते हर में नधाइल बैलहाटा के


बर्घन के भंसे लागेला ठेहून


ट्रेक्टर के पहिया फंस के


लेवाड़ मारेले हीक भ


करईल के चिमर माटी चमोर देले


उखमंजल के हाँक – दाब


हेठार खातिर दखिनहा, बाल के पछिमहा


भरकी के वासी मंगनचन ना होखे दउरा लेके कबो


बोअनी के बाद हरियरी, बियाछत पउधा के सोरी के


पूजत रहे के बा उनकर आदिये के सोभाव


जांगर ठेठाई धरती से उपराज लेलन सोना


माटी का आन, मेहनत के पेहान के मानले जीये के मोल


( ll )

शहर के सड़की पर अबो


ना चले आइल उनका दायें – बायें


मांड – भात खाए के आदी के रेस्तरां में


इडली – डोसा चीखे के ना होखल अब ले सहूर


उनकर लार चुवे लागेला


मरदुआ – रिकवंछ ढकनेसर के नाव प


सोस्ती सीरी वाली चिट्ठी बांचत मनईं


न बुझ पावल अबले इमेल – उमेल के बात


कउडा त बइठ के गँवलेहर करत


अभियो गंवार बन के चकचिहाइल रहेले


सभ्य लोगन के सामने बिलार मतिन


गोल – मोल – तोल के टेढबाँगुच


लीक का भरोसे अब तक नापे न आइल


उनका आगे बढे के चाह

माँल  में चमकऊआ लुग्गा वाली मेहरारू


कबो न लुझेलीसन उनका ओर


कवलेजिहा लइकी मोबाईल प अंगुरी फेरत चोन्हा में


कनखी से उनका ओर बिरावेलीसन मुंह


अंग्रेजी में किडबिड बोलत इसकोलिहा बाचा


उनका के झपिलावत बुझेलसन दोसरा गरह के बसेना


शहरीन के नजर में ऊ लागेलन गोबरउरा अस


उनका के देखते छूछ्बेहर सवखिनिहाँ के मन में भभके लागेला


घूर के बास , गोठहुल के भकसी, भुसहुल के भूसी

( lll )

जब ले बहल बा बजरुहा बयार


धूर लेखा उधिया रहल बा भरकी के गाँव, ओकर चिन्हानी


खेत – बधार , नदी – घाट , महुआ – पाकड़


बिकुआ जींस मतीन घूम रहल बाड़ीसन मंडी के मोहानी प


जहवाँ पोखरी के गरइ मछरी के चहुपता खेप


चहुपावल जा रहल बा दूध भरल डिब्बा


गोडार के उप्रजल तियना


खरिहान में चमकत धान, बकेन, दुधगर देसिला गरु के देसावर


समय के सउदागर लूट रहल बा


हमनी के कूल्ह संगोरल थाती


धार मराइल बा सपना प


दिनोदिन आलोपित हो रहल बा मठमेहर अस


धनखर देस पुअरा से चिन्हइला के पहचान


मेट गइल फगुआ चइता – कजरी के सहमेल


भुला गइल खलिहा बखत हितई कमाये जाये के रेवाज


ख़तम हो रहल बा खरमेंटाव के बेरा


सतुआ खाये माठा घोंटे के बानि


छूट गइल ऊ लगन जब आदमी नरेटी से ना


ढोढ़ी के दम से ठठा के हँसत रहे जोरदार


जवानी बिलवारहल बाड़े एहीजा के नवहा


पंजाब, गुजरात, का कारखाना में देह गलावत


बूढ़ झाँख मारताडे कुरसत ज़माना के बदलल खेल प


बढ़ता मरद के दारु, रोड प मेहरारू के चलन


लइका बहेंगवा बनल बुझा रहल बाड़ें जिये के ललसा


सूअर के खोभार अस बन रहल बा गाँव – गली


कमजोर हो रहल बा माटी के जकडल रहे के


धुडली घास ,बेंगची, भरकभाड के जड़न के हूब.


(IV)

दिनदुपहरिये गाँव के मटीगर देवाल में


सेंध फोरत ढुक गईल बा शहर


कान्ही प लदले बाज़ार


पीठी प लदले विकास के झुझुना


कपार प टंगले सरकारी घिरनई


अंकवारी में लिहले अमेरिकी दोकान


एह नया अवतार प अचंभों में


पडल बा गाँव भरकी के


ना हेठारो के ना पूरा दुनिया – जहान के


जइसे सोझा पड़ गईल होखे मरखाहवा भंइसा


भागल जाव कि भगावल जाव ओके सिवान से


भकसावन अन्हरिया रात में लुकार बान्ह के.

Friday, 14 September 2018

लक्ष्मीकांत मुकुल की राम मनोहर लोहिया पर कविता

घना बरगद थे लोहिया / लक्ष्मीकान्त मुकुल






झाड-झंखाड़ नहीं, घना बरगद थे लोहिया 
जिसकी शाखाओं में झूलती थी समाजवाद की पत्तियां 
बाएं बाजू की डूलती टहनियों से 
गूंजते थे निःशब्द स्वर 
‘दाम बांधो, काम दो,
सबने मिलकर बाँधी गाँठ,
पिछड़े पाँवें सौ में साठ’
दायें बाजू की थिरकती टहनियों से 
गूंजती थी सधी आवाज़ 
‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी’
बराबरी, भाईचारा के उनके सन्देश 
धुर देहात तक ले जाती थीं हवाएं दसों दिशाओं से 
सामंतवाद, पूंजीवाद की तपती दुपहरी में 
दलित, गरीब, मजदूर-किसान
ठंढक पाते थे उसकी सघन छाँव में 
 
बुद्धीजीवियों के सच्चे गुरु 
औरतों के सच्चे हमदर्द 
भूमिहीनों के लिए फ़रिश्ता थे लोहिया 
बरोह की तरह लटकती आकांक्षाओं में 
सबकी पूरी होती थी उम्मीदें 

अपराजेय योद्धा की तरह अडिग 
लोहिया की आवाज़ गूंजती थी संसद में 
असमानता के विरुद्ध 
तेज़ कदम चलते थे प्रतिरोध में मशाल लिए
उनकी कलम से उभरती थी तीखी रोशनी 
चश्मे के भीतर से झांकती 
उनकी आँखें टटोल लेती थीं 
देश के अन्धेरेपन का हरेक कोना

लक्ष्मीकांत मुकुल की सूचना के अधिकार पर कविता

सूचनाधिकार कानून / लक्ष्मीकान्त मुकुल






सत्तासीनों ने सौंपा है हमारे हिस्से में 
गेंद के आकर की रुइया मिठाई 
जो छूते ही मसल जाती है चुटकी में 
जिसे चखकर समझते हो तुम आज़ादी का मंत्र

यह लालीपाप तो नहीं 
या, स्वप्न सुंदरी को आलिंगन की अभिलाषा
या, रस्साकशी की आजमाईश
कि बच्चों की ललमुनिया चिरई का खेल 
या, बन्दर – मदारी वाला कशमकश 
जिसमें एक डमरू बजता है तो दूसरा नाच दिखाता
या, सत्ता को संकरे आकाश-फांकों से निरखने वाले 
निर्जन के सीमांत गझिन वृक्षवासियों की जिद 
या कि, नदी - पारतट के सांध्य – रोमांच की चुहल पाने 
निविडमुखी खगझुंडों की नभोधूम 

सूचनाधिकार भारतीय संसद द्वारा 
फेंका गया महाजाल है क्या ?
जिसके बीच खलबलाते हैं माछ, शंख, सितुहे
जिसमें मछलियाँ पूछती हैं मगरमच्छों से 
कि वे कब तक बची रह सकती हैं अथाह सागर में
जलीय जीव अपील-दर-अपील करते हैं शार्क से 
उसके प्रलयंकारी प्रकोप से सुरक्षित रहने के तरीके 
छटपटाहट में जानने को बेचैन सूचना प्रहरी 
छान मारते हैं सागर की अतल गहराई को
हाथों में थामे हुए कंकड़, पत्थर, शैवाल की सूचनाएं 

एक चोर कैसे बता सकता है सेंधमारी के भेद 
हत्यारा कैसे दे सकता है सूचना 
जैसा कि रघुवीर सहाय की कविता में है - ‘आज 
खुलेआम रामदास की हत्या होगी और तमाशा देखेंगे लोग ‘
मुक्तिबोध जैसा साफ़ – स्पष्ट 
कैसे सूचित करेगा लोक सूचना पदाधिकारी 
जैसा कि उनकी कविता में वर्णित है कि
अँधेरे में आती बैंड पार्टी में औरों के साथ 
शहर का कुख्यात डोमा उश्ताद भी शामिल था 
एक अफसर फाइल नोटिंग में कैसे दर्ज करेगा 
टाप टू बटम लूटखसोट का ब्यौरा 
कि विष-वृक्षों की कैसी होती हैं
जडें, तनें, टहनियाँ और पत्तियां?

बेसुरा संतूर बन गया है सूचना क़ानून 
बजाने वाला बाज़ नहीं आता इसे बजाने से 
यह बिगडंत बाजा, बजने का नाम नहीं ले रहा 
आज़ाद भारत के आठ दशक बाद 
शायद ही इसे बजाने का कोई मायने बचा हो 
गोरख पाण्डेय की कविता में कहा जाए तो 
‘रंगों का यह हमला रोक सको तो रोको 
वर्ना मत आंको तस्वीरें 
कम-से-कम विरोध में

Thursday, 13 September 2018

लक्ष्मीकांत मुकुल की नदी पर कविता


झींगा मछली की पीठ पर
तैरती नदी में
नहा रहे थे कुछ लोग
कुछ लोग जा रहे थे
काटने गेहूं की बालियां
पेड़ों की ओट में
अपना सिर खुजलाते
देख रहे थे तमाशा
कुछ लोग
सूरज के उगने
दिन चढ़ने
और झुरमुटों में दुबकने की घड़ी
कंघों पर लादे उम्मीदों का आसमान
पूरा गांव ही तन आया था
उनके भीतर
जो खोज रहे होते थे
कोचानो का रोज बदलता हेलान
क्षितिज की तरफ वह
आवाज भर रहा है अंध
आंखों से दीख नहीं रहा उसे कुछ भीद्ध
कुछ लोग चले जा रहे थे तेज कदम
जिध्र लिपटते धुंध् से
उबिया रहा था उसके
नदी पार का गांव।

लक्ष्मीकांत मुकुल की हवाई जहाज पर कविता

गूंगी जहाज

सर्दियों की सुबह में


जब साफ़ रहता था आसमान


हम कागज़ या पत्तों का जहाज बनाकर


उछालते थे हवा में


तभी दिखता था पश्चिमाकाश में


लोटा जैसा चमकता हुआ


कौतूहल जैसी दिखती थी वह गूंगी जहाज

बचपन में खेलते हुए हम सोचा करते


कहा जाती है परदेशी चिड़ियों की तरह उड़ती हुई


किधर होगा बया सरीखा उसका घोसला


क्या कबूतर की तरह कलाबाजियाँ करते


दाना चुगने उतरती होगी वह खेतों में


कि बाज की तरह झपट्टा मार फांसती होगी शिकार

भोरहरिया का उजास पसरा है धरती पर


तो भी सूर्य की किरणें छू रही हैं उसे


उस चमकीले खिलौने को


जो बढ़ रहा है ठीक हमारे सिर के ऊपर


बनाता हुआ पतले बादलों की राह


उभरती घनी लकीरें बढ़ती जाती है


उसके साथ


जैसे मकड़ियाँ आगे बढ़ती हुई


छोडती जाती है धागे से जालीदार घेरा


शहतूत की पत्तियाँ चूसते कीट


अपनी लार ग्रंथियों से छोड़ते जाते हैं


रेशम के धागे


चमकते आकाशीय खिलौने की तरह


गूंगी जहाज पश्चिम के सिवान से यात्रा करती हुई


छिप जाती है पूरब बरगद की फुनगियों में


बेआवाज तय करती हुई अपनी यात्रायें


पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण निश्चित किनारों पर


पीछे – पीछे छोड़ती हुई


काले – उजले बादलों की अनगढ़ पगडंडियां.


नोट – हमारे भोजपुरांचल में ऊंचाई पर उड़ता बेआवाज व गूंगा जहाज को लोगों द्वारा स्त्रीवाचक सूचक शब्द “गूंगी जहाज” कहा जाता है. इसलिए कवि ने पुलिंग के स्थान पर स्त्रीलिंग शब्द का प्रयोग किया है.